स्वस्थ्य जीवन के लिए ऋतूचर्या का ज्ञान

स्वस्थ्य जीवन के लिए ऋतूचर्या का ज्ञान

रोग की चिकित्सा करने की अपेक्षा रोग को ना होने देना ही अदिक श्रेष्ठ है और यह कहने की आवश्यकता नहीं की ऋतू चर्या या दिनचर्या या रात्रि चर्या के सम्यक परिपालन इ रोग का निश्यय ही प्रतिरोध होता है |श्रेष्ठ पुरुष स्वस्थ्य को ही सदा चाहते हैं , अतः वैध को चाहिए की मनुष्य जिस विधि के सेवन से सदा स्वस्थ्य रहे उसी विधि का सदा सेवन कराये | आयुर्वेद शास्त्र में ऋतू चर्या या दिनचर्या या रात्रि चर्या इ जो विधि वर्णित की गयी है , उसका नियम पूर्वक आचरण करने से मनुष्य सदा स्वस्थ्य रह सकता है |ऋतुओं के लक्षण से पूर्ण रूप से अवगत हो जाने के उपरांत उनके अनुकूल आहार , विहार का सेवन करना चाहिए अतः रितुचार्य से पूर्व ऋतू –विभाग का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए |

प्रक्रितिकृत शितोश्नादी सम्पूर्ण काल को ऋषि मुनियों ने एक वर्ष में संवरण किया है , सूर्य एवं चन्द्रमा की गति – विभेद से वर्ष के दो विभेद किये गए हैं जिन्हें अयन कहते हैं , वे अयन दो हैं 1. उत्तरायण और २. दक्षिणायन | उत्तरायण में रात्रि चोटी और दिन बड़े होने एवं सूर्य की रश्मियों के प्रखर होने से चराचर की शक्तियाँ शोषित होती हैं |इसलिए इसे आदान काल भी कहा गया है और दक्षिणायन में दिन छोटे और रात्रि बड़ी होने लगती है जिससे चन्द्रमा की मरीचिकाएँ प्रबल होकर प्राणियों को बल एवं अदिक पोषण प्रदान करती है |  

इन यानो में प्रत्येक के तीन तीन उपविभाग किये गए हैं जिन्हें ऋतू कहते हैं जिसके हिसाब से पुरे वर्ष को छह ऋतुओं में विभक्त किया गया है तथा अयुर्वेदशास्त्र में दोषों के संचय प्रकोप तथा उपशमन के लिए इन्ही छह ऋतुओं को मानते हैं | जिस ऋतू में जिस रस सेवन की विधि कही गयी है उस ऋतू में अयुर्वेदानुसार उसी रस का सेवन अधिक करना चाहिए –

“ नित्यं सर्वरसाभ्यास: स्वस्वाधिक्यम्रितावृतौ “ 

1.वसंत ऋतू (चैत्र वैसाख)

वसंत ऋतुओं में सभी दिशाएं रमणीय एवं नाना प्रकार के पुष्पों से सुशोभित होती है , इस समय शीतल मंद सुगंध पवन मलयाचल से प्रवाहित होता है , अपनी इस अनुपम सुषमा एवं मनोहरता के कारन ही यह ऋतुराज कहलाता है |शिशिर ऋतू में मधुर , सनिध आहार अधिक सेवन से और काल स्वाभाव से  श्लेष्मा अधिकतर संचित हो जाता है तथा वसंत ऋतू में सूर्य की रश्मियों द्वारा तप्त होकर कफ़ जलस्वरूप होकर जठराग्नि को नष्ट करके अनेक रोगों की उत्पत्ति करता है अतः उसे शीघ्र जितना चाहिए |

कफस्चिचितो ही शिशिरे वसन्ते कन्शुतापितः |

हत्वार्ग्नी कुरुते रोगान तस्तं त्वरया जयेत ||

इसके लिए कफ़ –नि:सारक औषधियों के द्वारा वामन तथा उर्ध्वांग शुद्ध करें ,व्यायाम करना , उबटन लगाना ,रूखे , कसैले, कटु ,तिक्त ,रस ,ताम्बुल ,कर्पुर ,मध् के साथ हरीतकी चूर्ण सेवन करें ,श्वेत वस्त्र धारण करें , प्रातः सायं भ्रमण करें – ‘वसन्ते भ्रमणं पथ्ये ‘ |

भ्रमण से कफ का हास एवं रक्त संचार तीव्र गति से होता है | सोंठ का क्वाथ तथा विजयसार चंदानादी से बना जल पियें , मधु मिश्रित जल तथा नागरमोथा से बना क्वाथ पियें |

इस ऋतू में न मधुर ,तिक्त ,अमल ,स्निग्ध तथा गरिष्ठ पदार्थ , शीत द्रव्य ,अरबी ,कचालू ,उरद ,ओंस में निद्रा लेना और दधी वर्जित है| इसी प्रकार उलोलेखनिय है जहाँ तरुण दधि प्राण हर होता है , वही न तो भोजन के अंत में और न रात्री में दही खाना चाहिए |

.ग्रीष्म ऋतू (ज्येस्ठआसाढ़)   

ग्रीष्म ऋतू में सूर्य की किरने बहुत ही तीक्ष्ण होती है |जिससे प्राणियों के बल और जगत की आद्रता का शोषण होता है इसके परिणामस्वरूप कफ़ मंद हो जाता है और शरीर में वायु संचित होकर वृद्धि को प्राप्त होता है जिससे विविध प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं |ग्रीष्म ऋतू में जौ ,गेहूँ ,शिलिचावल ,मटर ,अरहर ,कच्चा खीर ,तरबूजा ,ककड़ी ,पेठा ,करेला ,बथुवा , चौलाई ,घिया ,परवल , मधुर रस युक्त लघु ,स्निग्ध ,शीतल सुपाच्य पदार्थो का सेवन करना चाहिए , मिश्री युक्त दूध खंड युक्त दही या मट्ठा , मिश्री ,मोचरस ,चोचमोच , शीतल सरबत आदि स्वस्थ्य प्रद है , शीतल जल से घुला ,केवड़े आदि दे सम्बंधित ,खस की टट्टियों से आच्छादित घर ,सघन वृक्षों की छाया , प्रातः शीतल जल से स्नान तथा दिन में निद्रा – इस ऋतू की उग्रता की शांत करती है | गुड के साथ हरीतकी का सेवन करना चाहिए |

अधिक लवणयुक्त , कटु , अम्ल्पदार्थ ,अदिक व्यायाम , उष्ण जल से स्नान ,उपवास ,धुप में पदयात्रा करना , अधिक परिश्रम , तिल तेल , बैगन ,उड़द . सरसों राइ का शाक , गरिष्ठ भोजन ,भय , क्रोध ,स्त्री सहवास एवं उग्र वायु सेवन स्वस्थ्य के लिए हानिप्रद है |

.वर्षा ऋतू(श्रावणभाद्रपद)

वर्षा ऋतू में चारों और हरियाली एवं गगन मेघच्छादन रहता है , दूषित जल तथा वास्प युक्त वायु से पाचन प्रणाली पर बुरा प्रभाव पड़ता है , जिससे मन्दाग्नि मंद हो जाती है , तुषार पूर्ण शीतल वायु से तथा ‘ग्रीष्मे संचियते वायु: प्रावीट –काले -प्रकुप्यति’—से शरीरअभ्यन्तरिय वायु पृथ्वी की दूषित वास्प से और  जलों के अम्ल्पक होने तथा जल वायु की मलिनता से पित्त तथा अग्निमंध होने से और पशु किटादी के मल  मूत्र के संसर्ग से  वर्षा का जल मलिन हो जाने से कफ़ आदि के पृथक पृथक अथवा दो या दो या तीनो दोषों के मिल जाने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं |अतः वर्षा ऋतू में अग्नि की रक्षा करनी चाहिए | अग्नि के विकृत होने पर नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं | अग्नि की साम्यावस्था बनाये रखना अपरिहार्य है |– समदोष: समग्निश्च ….स्वस्थ इत्याभिदियते |

वर्षाकाल में अग्निवर्धक भोजन जैसे मूंग , जूस ,पुराने यव ,गेहूं ,शालिचावल ,षडरस , मस्तु , कला नमक ,पिप्पली ,त्रिचक ,शोंठ मिलकर पीना चाहिए |

गरम दूध ,करेला ,तोरई , अंजीर, खजूर ,आम , खांड ,गूढ़ , परवल ,कुएं या वर्षा का जल अथवा उबला हुआ जल सेवन करना चाहिए |सुगन्धित तेल आदि लगाकर स्नान करना चाहिए तथा समय समय पर वस्त्रों को धुप में भी रखना चाहिए |वर्षा ऋतू में नदी का तट ,जल युक्त सत्तू , दिन में निद्रा लेना ,व्यायाम ,अधिक परिश्रम ,धुप ,स्त्री सहवास त्याज्य है |

 .शरद ऋतू(आश्विन कार्तिक)

इस ऋतू में सूर्य का वर्ण पिला और उष्ण होता है |आकाश निर्मल तथा श्वेत मेघों से युक्त होता है | तालाब कमलों तथा हंसो से तुक्त होकर पृथ्वी – वरुण , सप्तपर्ण , जियापोता , कांस , विजयासार के वृक्षों से शोभायमान होता है | तडाग , सरिता आदि का जल स्वच्छ होता है | दी नमें सूर्य की किरणों आदि से तप्त एवं रात को चन्द्र रश्मियों से शीत होकर , अगस्त्य तारा के उदय से निर्विष हो जाता है जो की न अभिश्यन्धी और न रुक्ष होकर अमृत के समान कहा गया है |यथा –

तप्त तप्तान्शु किरणे: शीतं शीतांशु रश्म्भी |

समानतादप्यहोरात्रमगस्तयोदयनिर्विषम ||

शुची हंशो दकम नाम निर्मलम मलाज्जिजलम |

नाभिश्यन्धी न वा रूक्षं पनादिश्व्व्मृतोप्मम ||

यह ऋतू स्वस्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है , इसलिए ऋतुओं नेसतायु की कामना करते हुए सौ शरद ऋतुओं के जिनकी कामना की है | यथ – ‘जीवेद् शरदः शतं’ |

इस ऋतू में तिक्त द्रव्य ,घृत सेवन ,विरेचन तथा रक्तमोक्षण हितकर है |मधुर .तिक्त ,कषाय-रस, शीतल तथा लघु आहार , मीठा दूध मिश्री युक्त हरढ़ अथवा आमला चूर्ण , यव ,मूंग ,शालिचावल ,धनिया , सैन्धव लवण , मुनक्का , परवल , कमलनाल , कमल गट्टा , नारियल , नदी अथवा तालाब का जल , कर्पुर , चन्दन आदि हितकर है |

.हेमंत ऋतू (मार्गशीर्ष पौष) 

इस ऋतू में सूर्यास प्रायः तुषार से आछनˎन  रहता है ,दिशाएं धुल धुश्रित होती हैं तथा शीतल पवन चलता है |रात्रि अन्य रऋतुओं की अपेक्षा दीर्घ होती है | इस ऋतू में अधिक शीत वायु के कारन रुकी हुई अग्नि देह के अन्दर उसके छिद्रों से प्रेरित होकर अपने स्थानों में संचित होकर प्रचंड हो जाती है , इसलिए हेमंत में वायु तथा अग्नि नाशक विधि का उपयोग श्रेष्ठमाना गया है |यथा – 

शितेṠनीलांलहरोर्विधिरिष्यतेṠत:|

यहाँ यह भी ध्यान देना जरूरी है की क्षुधा के समय भोलन ना मिलने पर व्यक्ति के शरीर की अग्नि उसके शरीर के अन्य धातुओं को पचाकर बल का नाश तो करती ही है , स्वयं भी बिना लकड़ी के अग्नि की तरह शांत हो जाती है | यथा – 

आहारकाले सम्प्राप्ते यो न भूंक्ष्ते बुबुक्क्षितः|

तस्य सीदते कायाग्निर्निरिन्धन: इवानल: ||

इस ऋतू में मधुर ,स्निध ,अम्ल तथा लवणयुक्त द्रव्य , गेहूं , इक्षुरस तहत दुग्ध से बने पदार्थो के सेवन सेवनिय है और सोंठ के साथ हरड का सेवन करना चाहिए |प्रातःकाल का भोजन ,तजा अन्न ,गरम तथा नरम वस्त्र ,विधिपूर्वक यथावश्यक धुप तथा अग्नि का सेवन , कठोर श्रम , तेल मालिश तथा केशर , कश्तुरी का लेप हितकर है |

इस ऋतू में कषैला ,कटु ,तिक्त , रुक्ष अन्न से बना भोजन , हल्का तथा शीतल भोजन , सत्तू , उड़द , केला ,आलू , तोरई , एकाहार , निराहार , शीतल जल में स्नान , नदी के जल का पान , दिन में निद्रा , ठन्डे स्थान में विहार तथा खुले में निवास त्याग दे |

.शिशिर ऋतू (माघ  फाल्गुन)

शिशिर ऋतू के सभी लक्षण एवं सिंचार्य प्रायः हेमंत ऋतू के समान ही होते हैं | इस ऋतू में वायु तथा वर्षा से आकाश आचाद्दित रहता है | शीत भी अपेक्षाकृत आधिक रहती है , कहीं कहीं कोहरा भी अधिक पड़ता है | भूमि पके हुए घासों से पीतवर्ण हो जाती है | पवन तथा कफ़ के विकार उत्पन्न होते हैं |

शिशिर ऋतू में शौच तथा स्नान आदि हेतु नीरवत स्नान एवं उष्ण जल का स्नान एवं सेवन एवं समान पिपली मिलाकर हरीतकी का सेवन करें, शुगंधित चटनी , जिमीकंद ,पिट्टी की पकौड़ी ,बढ़िया भोजन ,अदरक आदि का अचार , हिंग , सैन्धव लवन , घ्रित्युक्त स्निग्ध भोजन , खिचड़ी आदि का सेवन शिशिर ऋतू में हितकर है |

हेमंत ऋतू में जो पदार्थ वर्ज्य बताये गए हैं , उन्हें इस ऋतू में भी त्याज्य समझना चाहिए | यथा –

सर्वं हिमोक्तं शिशिरै:|   

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