चिरˎकालीन स्वस्थ्य रहने के मंत्र

चिरˎकालीन स्वस्थ्य रहने के मंत्र

भगवत कृपा से मनुस्य योनी चौरासी लाख योनियों में भटकने के उपरांत प्राप्त होता है| मानव जीवन का एकमात्र उद्धेश्य है अपना कल्याण कर जन्म मृत्यु के बन्धनों से स्वयं को मुक्त करना |मनुष्य मात्रा ही अपने कर्म और संकल्प से इश्वर कृपा को प्राप्त करता है पर यह तभी संभव है जब शरीर और मन पूरी तरह निरोगी और स्वस्थ हो | इसलिए सदा व्यक्ति को सचेत रहने की आवश्यकता होती है | प्रारब्धवश अपने पूर्व कर्मो और वर्तमान गलतियों के कारन व्यक्ति अनेकानेक रोगों से ग्रसित हो जाता है |
हमारे यहाँ ऋषि मुनियों के द्वारा इसिलिये सदाचार और शौचाचार के अंतर्गत मानवमात्र के लिए जीवनचर्चा और दिनचर्या प्रस्तुत की गयी है | जिनका पालन करने पर लोक परलोक दोनों सुधर सकते हैं | वास्तव में हमारे शास्त्र में ऐसे विधान हैं जिनका आस्था पूर्वक पालन करने पर भूलोक में निरोगी और स्वस्थ्य रहते हुए परलोक का मार्ग भी प्रसस्त होता है तथा भगवत प्राप्ति का सामर्थ्य उत्पन्न होता है |
आचारः परमो धर्मः
अर्थात आचार विचार परम धर्म है | सदाचार में लगे हुए मनुष्य का शरीर स्वस्थ्य , मन शांत और बुद्धि निर्मल होती है उसका अंतःकरण शुद्ध रहता है | शुद्ध अंतःकरण ही वस्तुतः भगवान् का स्थिर आसन लगता है | इसीलिए मनुष्य को धर्माचार पूर्वक आचार विचार करना चाहिए क्यूंकि जो पुरुष दुराचारी है , उसकी लोक में निंदा होती है,वह सदा दुःख भोगता है तथा रोगी और अल्पायु वाला होता है तथा सभी गुणों से हीन पुरुस भी यदि सदाचारी और श्रद्धावान और इर्षारहित होता है तो वह भी सौ वर्षो तक जीता है | अतः शास्त्रोक्त जीवनचर्या तथा दिनचर्या के पालन करने पर स्वाथ्य आदि भौतिक लाभ के साथ आध्यात्मिक लाभ की भी प्राप्ति संभव है |
प्रातः जागरण
पूर्ण स्वस्थ्य रहने के लिए कल्याणकामी व्यक्ति को प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में अर्थात सूर्योदय से पूर्व श्य्यात्याग करना चाहिए | इस समय उठनेवाला का स्वाथ्य, धन, विद्या, बल और तेज बढता है | जो सूर्योदय के पूर्व सोता है उसकी शक्ति और उम्र घटती है एवं वह अनेक बिमारियों से ग्रसित होता है | प्रातःकाल उठते ही भगवन का स्मरण और ध्यान करना चाहिए तथा भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए की दिनभर मेरे अन्दर सात्विक बुद्धि बनी रहे सद्बुद्धि बनी रहे , आत्मबल बना रहे जिससे मै केवल भले और कल्याणकारी कार्यों को ही दिन भर सम्पादित करूँ |
उषा पान
प्रातःकाल शय्या त्याग करने के पूर्व ही जल पिने का विधान है | रात्रि में ताम्र पात्र में ढककर रखा हुआ जल, प्रातःकाल कम से कम आधा लीटर बठे हुए स्तिथि में धीरे धीरे पीना चाहिए | इसे उषापान कहते हैं | इससे त्रिदोष अर्थात कफ़, वायु और पित्त का विकार दूर होता है, शरीर दीर्घायु और बलवान बनता है पेट में जमा मल साफ़ होता है | जिससे पेट के समस्त विकार दूर होते हैं बल बुद्धि और ओज बढता है |
मल मूत्र त्याग
उषा पान के उपरांत मलमूत्र का त्याग करना चाहिए मलमूत्र का त्याग करते समय सर को कपडे से ढक लेना चाहिए तथा ऊपर निचे के दांतों को जोर से सटाकर रखना चाहिए | इससे दन्त मजबूत बनता है बिमारियों से मुक्त रहता है | मलमूत्र त्याग के समय मौन रहना चाहिए तथा जोर नहीं लगाना चाहिए मल त्याग के पश्चात स्वच्छ जल से लिंग व गुदा द्वार को अच्छे से धो लेना चाहिए | संभव हो तो मिटटी से धोना चाहिए जिससे बवासीर नहीं होता तत्पश्चात अच्छे से हाथ और पैरों को शुद्धता से धो लेनी चाहिए | ये क्रियाएं सौचाचार कहलाती हैं |
दंतधावन
शौच निवृत्ति के पश्चात मज्जन तथा दातौन से दांतों को साफ कर लेनी चाहिए | नीम और बबूल दांतों के सुरक्षा हेतु अधिक लाभप्रद हैं | दांत साफ करने के पश्चात जीभी से जीव भी साफ करनी चाहिए और अच्छे से कुल्ला करनी चाहिए |
व्यायाम
शरीर को मजबूत और स्वस्थ्य रखने के लिए, कार्य करने की शक्ति बनाये रखने के लिए तथा पाचन क्रिया और जठराग्नि को ठीक रखने के लिए शरीर को सुगठित, सुद्रिड और सुडौल बनाने की दृष्टी से अपने सामर्थ्य अनुसार नियमित योगासन और व्यायाम करनी चाहिए | ऐसा करने से व्यक्ति रोग मुक्त रहता है और बीमार नहीं पड़ता |प्रातकाल खुली – ताज़ी हवा में घूमना चाहिए जिससे शुद्धवायु फेफड़ो में पहुचती है और स्वसंतंत्र तथा रक्त का संचार सही होता है |
अभ्यंग(तेल मालिश)
वात, जरा तथा श्रम को समाप्त करने के लिए तथा शरीर को दृढ,पुष्ट तथा दृष्टी वृद्धि के लिए नित्य तेल मालिश करनी चाहिए | रोज सारे बदन पर तेल मालिश करने से बड़ा लाभ मिलता है | अनेकानेक रोगों से तेल की नित्य मालिश शरीर की रक्षा करता है |
क्षौर क्रिया
क्षौर से तात्पर्य है दाढ़ी, नख और बाल कटवाना | हिन्दू धर्मानुसार एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या ,पूर्णिमा, सुर्यसंक्रंती ,शनिवार, गुरुवार ,मंगलवार ,बृहस्पतिवार तथा श्राद्ध आदि दिनों को छोड़कर क्षौर कर्म किया जा सकता है | क्षौर कर्म नित्य करने से शरीर के अंदर, बाहरी अंगो से बीमारियाँ प्रवेश नहीं कर पाती हैं |
स्नान
व्यक्ति को प्रत्येक दिन स्वच्छ जल से स्नान करना चाहिए | मंत्रोचार के साथ तभी वह स्नान के उपरांत ही मंत्रजाप ,संध्या वंदन ,स्तोत्र आदि पाठ तथा चरणामृत ग्रहण करने के योग्य बनता है | पवित्र बहती हुई नदियों में स्नान करना तथा शीतल निर्मल तालब में नहाना सबसे उतम है | शरीर को सूती वस्त्र से या हाथ से मलमलकर नहाना चाहिए जिससे बाहरी सारा मैल निकल जाये तथा रोमछिद्र खुल जाए | ज्वर ,रोग आदि में तथा पसीना आने पर ,कसरत या शारीरिक श्रम तथा भोजन के तुरंत बाद नहीं नहाना चाहिए | प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व नहा लेनी चाहिए जिससे आयु बल और पुष्टि की वृद्धि होती है | स्नान करने के उपरांत अंग पोछ कर शुद्ध धुला हुआ वस्त्र धारण करना चाहिए |
नित्याभिवादन
सदैव पूजा के उपरांत घर में उपस्थित बड़े बुजुर्गों तथा माता पिता का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेनी चाहिए | इससे यश ,आयु, बल, और विद्या की वृद्धि होती है गुरुजनों के आशीर्वाद से सारे कार्य फलीभूत होते हैं |
तिलकधारण
संध्या वंदन तथा पूजन आदि के पूर्व मस्तक पर भस्म , चन्दन और कुमकुम से अपने अपने संप्रदाय के अनुसार आदि तिलक करना चाहिए | तिलक धारण की बड़ी महिमा है तिलक मानसिक शक्तियों को केन्द्रीयकृत करता है |
संध्या तर्पण एवं पूजन
मनुष्य को सदा कम से कम दो काल की संध्या करनी चाहिए | जो प्रतिदिन पूजा पाठ नहीं करता है वह नरक का भागीदार बनता है , महान पापी माना जाता है और उसे नरक की यातना भोगनी पड़ती है | देवता,पितरों और ऋषि की तृप्ति के लिए प्रतिदिन तर्पण करे नित्य इस्टदेवों की आराधना करनी चाहिए | जो मनुष्य को मानसिक शक्ति, आत्मिक संबल और साहस प्रदान करते हैं |
पञ्चमहायज्ञ
शास्त्रों में प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति के लिए पञ्चमहायज्ञ करने का विधान है | इसके अंतर्गत स्वध्याय ,तर्पण ,हवन ,पंचबली तथा अतिथिपुजन आते हैं अतः इसे प्रतिदिन करने का प्रयास करना चाहिए | इससे परिवार और जीवन में कल्याण और सुख शांति बनी रहती है |
भोजन
भोजन सदा भगवान को भोग लगाकर ही करनी चाहिए और भगवान के भोग में तुलसी दल छोड़ने का विधान है क्यूंकि व्यज्ञानिक मत से भोजन में तुलसी दल छोड़ने से भोजन की विषाक्तता समाप्त हो जाती है | अतः जब भी भोजन करे भगवान को निवेदन करके ही ग्रहण करे प्रसाद रूप में | पैरों को धोकर कुल्ला करके हाथ मुह धोकर ही भोजन ग्रहण करनी चाहिय | सर्वप्रथम घर पर आये अथिथि और गर्भिणी स्त्री, वृद्ध ,विवाहित कन्या तथा छोटे बालकों को भोजन कराकर ही स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए| जिससे भोजन पुण्यमयी बनता है | गृहस्थ में भोजन दिन में दो बार ही करनी चाहिये | भोजन प्रारंभ करने से पूर्व लवणरहित तीन ग्रास ॐ भूपतये स्वाहा, ॐ भुवंपतये स्वाहा, ॐ भुपतानाम स्वाहा इन तीन मंत्रो का जाप करके थाली से बाहर दाई और निकालकर रखना चाहिए तथा इन्ही मंत्रो से जल भी छोडनी चाहिए तत्पश्चात भोजन ग्रहण करने से पूर्व लवणरहित पांच छोटे छोटे ग्रासों को – ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपनाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा ,ॐ उदानाय स्वाहा ,ॐ समानाय स्वाहा –इन पांचमंत्रो से मुह में लेनी चाहिए | इसका उद्देश्य जठराग्नि में आहुति प्रदान करने का भाव है तथा भोजन के पूर्व ॐ अम्रितोपसतरणमसि स्वाहा मंत्र से आचमन करनी चाहिए इसके पूर्व भोजन को चबा चबा कर बड़े ही शांत मन से ग्रहण करना चाहिए | जो अन्न को चबाकर नहीं खाता उसके दांत कमजोर हो जाते हैं | जिसके कारन अंतड़ियों पर जोर पड़ता है और जठराग्नि मंद पड़ जाती है | भोजन के समय कभी जल नहीं पीना चाहिए | सदा भोजन के एक घंटा पूर्व और एक घंटे के बाद ही जल पीना चाहिए भोजन के अंत में ॐ पस्तरणमसि स्वाहा मंत्रबोल कर भोजनप्रसाद को आच्छादित करनी चाहिए |
भोजन कभी भी अप्रसन्न मन से , बिना रूचि के ,भूख से अधिक और गरिष्ठ नहीं करनी चाहिए उतना ही भोजन करनी चाहिए जिसे पेट आसानी से पचा सके |

Leave a Reply