आयुर्वेद का अनादित्व

आयुर्वेद का अनादित्व

आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है| श्रृष्टि के प्रारंभ में ही प्रजापति ब्रह्मा जी ने लक्षात्मक श्लोकं में लोकोपकार के लिए इसकी रचना की थी , ग्रन्थ में एक हजार अध्याय थे |

इह खलु आयुर्वेदो नाम यदुपांगमथर्ववेदस्यानुतपाद्देव प्रजाः’’’’’’’’’’श्लोक शत सहस्त्रम्ध्यय्सहस्त्रम च कृत्वान स्वयंभू: |

वेद के समान आयुर्वेद के परंपरा भी नित्य, सनातन एवं अनादी हैं | पुराकाल में पुरुषों की आयु चार सौ वर्ष की होती थी | उनका शरीर स्वस्थ्य और पुष्ट होता था | कालक्रम से अधर्म का प्रादुर्भाव होने से आयु, आरोग्य , तथा बल का ह्वास होने लगा और उसी प्रमाण में सुख शांति का ह्वास होने लगा |दीर्घ आयु और चिर आयु की उपलब्धि के लिए महर्षि चरक ने महत्वपूर्ण आचार रसायन की प्रक्रिया निर्दिष्ट की |

यह रसायन वास्तव में कोई पेय औषधि नहीं है , एक प्रकार की नियमित आचार प्रक्रिया है , जो रसायन से भी अधिक कार्य करती है | यदि व्यक्ति इस अचार रसायन के अनुसार अपनी दैनिक चर्या व्यवतीत करता है तो दीर्घ आयु की प्राप्ति के साथ ही स्वस्थ्य एवं सुखी रहता हुआ धर्माचरण में सर्वथा सक्षम होता है और सात्विक सुख एवं आनंद का उपभोग करता है |स्वयं महर्षि चरक ने आयुर्वेद की – आचार रसायन की परिभाषा इस प्रकार की है –

सत्यवादिनमक्रोधं निवृत्तम मद्यमैथुनातˎ |

अहिंसकमनायासम प्रशान्तं प्रियवादिनमˎ ||

जपशौच परमधीरं दानंनित्यत्पस्विनामˎ |

देव्गोब्रह्मनाचार्यगुरुवृद्धार्चने रतम् ||

आन्रिशस्यपरमं नित्यं नित्यं करुण वेदिनमˎ |

सम्जागरण स्वप्नं  नित्यं क्षीरघृताशिनमˎ ||

देश काल प्रमाणज्ञं युक्तिज्ञ मनहंकृतम् |

शास्त्रचारमसंकीर्णमध्यात्मप्रवंर्नेंद्रियमˎ ||

 उपसितारम वृद्धानामासतिकानाम जितात्मनामˎ |

धर्मशास्त्रपरममˎ विद्यान्नरम नित्य रसायनंˎ ||

गुणेरेतै:समुदितै: प्रयुन्क्ते यो रसायनंˎ |

रसायनगुणानˎ सर्वानˎ यथोक्तानˎ स समश्नुते ||   

जो व्यक्ति सत्यवादी ,अक्रोधी , मद्द तथा मैथुन से निवृत , हिंसा रहित अनायास अर्थात अति शांत ,मृदुभाषी ,जप और शुद्धि में तत्पर , धैर्यशाली ,प्रतिदिन दान करने वाला तथा तपस्वी है एवं जो देव, गौ ,ब्राह्मण ,आचार्य ,गुरु तथा वृद्धों के सत्कार में रत हैं , नित्य अनुसंसता परायण तथा प्राणिमात्र में दय की दृष्टी रखता है ,जिसका जागरण एवं निद्रा प्रकृति के अनुकूल है ,जो नित्युआ घृत , दुग्ध का सेवन करता है जो देश काल के प्रभाव का ज्ञाता है , युक्ति यज्ञ है तथा अहंकार शुन्य है ,जो शाश्त्रों के अनुकूल आचरण करता है ,उदार प्रकृति का है , जिसके मनन बुद्धि और विचार अध्यात्म की और प्रवृत हैं जो जितात्मा आस्तिक वृद्धों का सेवक है , जो धर्मशास्त्र परायण हैं , वह यदि रसायन के इन गुणों का सेवन करता है तो यथोक्त फल को प्राप्त करता है | महर्षि चरक का औषधि रहित यह आचार रसायन आज के विश्व को और्वेद की अद्भूत और अनुपम देन है |

भारतीय आयुर्वेद वांग्मय में मनः समाधी का महत्व स्थान अथां पर वर्णित किया गया है |इसी मानसिक शांति को लक्ष्य मानकर महर्षि चरक ने स्पस्ट कहा है –

प्रेत्य चेह च यच्छ्रेयः श्रेयः मोक्षे च यत्परमˎ |

मनः समाधौ तत्सर्व मायत्तम सर्वदेहिनामˎ ||       

  इस लोक में मरण के अनंतर जन्मान्तर में, इतना ही नहीं अपवर्ग में भी प्राणिमात्र को जो कल्याण उपलब्ध होता है , वह सब मन : समाधी से प्राप्त होता है | अतः यह मानसिक शांति केवल उपर्युक्त आचार रसायन की जीवन चर्या में रहने से प्राप्त होती है | आज के विश्व मानव के लिए आयुर्वेद की यह दें बड़े महत्व की है | आयुर्वेद ने शारीरिक मानसिक तथा आगुन्तक रोगों का मूल कारण प्रज्ञापराध माना है –

प्रज्ञापराध: प्रधानमˎ रोगणामˎ(चरक) |

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